प्रस्तावना: रक्त से शांति का महाकुंभ
इतिहास केवल तारीखों और युद्धों का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि यह उन आत्माओं की यात्रा है जिन्होंने समय की धारा को मोड़ने का साहस किया। 'रक्त और प्रतिज्ञा' एक ऐसी ही गाथा है, जो दक्षिण भारत के महान सेनानायक और प्रधानमंत्री चामुंडराय के जीवन पर आधारित है। यह कहानी हमें दसवीं शताब्दी के उस कालखंड में ले जाती है जहाँ तलवारों की खनक और साम्राज्यों की भूख के बीच एक योद्धा अपने भीतर के बुद्ध को खोजता है।
यह पुस्तक चामुंडराय के उस रूपांतरण की कहानी है, जो पल्लव और क्रूर पांड्य राजाओं के विरुद्ध 'वीर मार्तंड' बनकर खड़ा होता है, लेकिन अंततः करुणा के सागर में डूबकर 'गोमट' बन जाता है। गंग साम्राज्य की रक्षा से शुरू होकर, गोमांतक के रहस्यमयी समुद्रों और पोदनपुर की दिव्य नगरी तक फैला यह सफर, पाठक को शौर्य, रोमांच, प्रेम और परम त्याग के एक ऐसे लोक में ले जाएगा जहाँ चमत्कार और सत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। यह मात्र एक जीवनी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की कहानी है जो अपने जीवन के युद्धों के बीच शांति की एक स्थायी 'गोमटेश्वर' प्रतिमा स्थापित करना चाहता है।
आभार: श्रद्धा और सृजन का संगम
इस महागाथा का सृजन उन पूर्वजों के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं था, जिन्होंने शिलालेखों और स्थापत्य कला के रूप में अपनी विरासत हमारे लिए छोड़ी।
सर्वप्रथम, मैं उन प्राचीन जैन मुनियों और इतिहासकारों का आभारी हूँ, जिनके ग्रंथों ने चामुंडराय जैसे महान व्यक्तित्व के धुंधले पड़ चुके इतिहास को फिर से जीवंत करने की प्रेरणा दी। मैं ऋणी हूँ उस पावन भूमि श्रवणबेलगोला और गोमांतक के उन तटों का, जिनकी हवाओं में आज भी यह कहानी जीवित महसूस होती है। विशेष आभार मेरे उन सभी पाठकों और मार्गदर्शकों का, जिन्होंने इस कथा के हर अध्याय में रोमांच और ऐतिहासिक सत्यता के बीच संतुलन बनाए रखने में मेरा सहयोग किया।चामुंडराय की पत्नी 'अजिता' जैसे पात्रों के माध्यम से त्याग की जो परिभाषा इस पुस्तक में उकेरी गई है, वह उन सभी मूक बलिदानों को समर्पित है जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गए हैं। अंततः, यह पुस्तक उन गुमनाम शिल्पियों के प्रति एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने छेनी और हथौड़े से पत्थरों में प्राण फूँके।
उपसंहार: समय की शिला पर अमिट पदचिह्न
हज़ारों साल बीत गए। साम्राज्य आए और धूल में मिल गए। पांड्य राजाओं का अहंकार और उदियान की क्रूरता अब केवल पुरानी कहानियों का हिस्सा है। लेकिन विंध्यगिरि की चोटी पर खड़ी वह ५७ फीट ऊँची दिगंबर प्रतिमा आज भी उसी शांत मुस्कान के साथ खड़ी है, जैसी चामुंडराय ने उसे पोदनपुर के दिव्य प्रकाश में देखा था।
चामुंडराय ने जो 'विजय स्तंभ' गोमांतक के तट पर अदृश्य रूप में स्थापित किया था, वह आज भी भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सीमाओं की रक्षा कर रहा है। उनकी उपाधि 'गोमट' आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि अहिंसा और सृजन का वैश्विक प्रतीक बन चुकी है। यह कहानी हमें सिखाती है कि वास्तविक विजय वह नहीं जो रक्त बहाकर हासिल की जाए, बल्कि वह है जो आने वाली पीढ़ियों के हृदय में शांति और करुणा का बीज बो सके।
जब तक श्रवणबेलगोला में महामस्तकाभिषेक के मंत्र गूँजेंगे और जब तक कोंकण का समुद्र अपनी लहरों से तट को छुएगा, 'वीर मार्तंड' चामुंडराय और उनके द्वारा रचित 'ईश्वर' की यह गाथा जीवित रहेगी। पत्थर मर सकते हैं, पर एक योद्धा की वह प्रतिज्ञा कभी नहीं मरती जो मानवता के कल्याण के लिए ली गई हो।